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Charak Movie Review: रहस्य, थ्रिल और अंधविश्वास से भरी दमदार कहानी

Charak Movie Review: शीलादित्य मौलिक की यह सोशल थ्रिलर आस्था और अंधविश्वास के खतरनाक पहलुओं को दिखाती है। जानिए कहानी, अभिनय, संगीत और फिल्म की पूरी समीक्षा।

Charak Movie Review: आस्था और अंधविश्वास के बीच झूलती डरावनी सच्चाई

सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज की सच्चाइयों को दिखाने का भी एक सशक्त जरिया है। निर्देशक शीलादित्य मौलिक की फिल्म चांदपुर चारक मेला भी इसी तरह की एक सामाजिक थ्रिलर है, जो आस्था और अंधविश्वास के बीच की महीन रेखा को बेहद प्रभावी तरीके से सामने लाती है।

यह फिल्म लेखक संजय हलदर की इसी नाम की लघु कहानी पर आधारित है। कहानी एक छोटे से गांव चांदपुर में होने वाले धार्मिक चारक मेले से पहले के दो हफ्तों के घटनाक्रम को दिखाती है। इसी दौरान एक मासूम बच्चे की हत्या हो जाती है और कहानी धीरे-धीरे रहस्य, अंधविश्वास और सामाजिक सच्चाइयों के जाल में उलझती चली जाती है।

फिल्म की कहानी

फिल्म की शुरुआत गांव के मासूम बच्चे कानू से होती है। चारक मेले से ठीक पहले उसकी रहस्यमयी तरीके से हत्या हो जाती है। यह घटना पूरे गांव को झकझोर देती है।

चारक मेला देवी काली और भगवान शिव को खुश करने के लिए मनाया जाता है। इस मेले में कई तरह की कठोर धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं। कहानी का सबसे डरावना पहलू यह अंधविश्वास है कि यदि कोई निःसंतान दंपत्ति किसी बच्चे की बलि देता है, तो उसे संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिल सकता है।

यहीं से कहानी में रहस्य और गहराता है। सवाल उठता है कि क्या कानू की हत्या इसी अंधविश्वास के कारण हुई, या इसके पीछे कोई और सच्चाई छिपी हुई है।

फिल्म इसी रहस्य को धीरे-धीरे खोलती है और दर्शकों को अंत तक बांधे रखती है।

दो अलग दुनिया की समान पीड़ा

फिल्म की कहानी दो अलग-अलग परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनकी परिस्थितियां भले ही अलग हों, लेकिन दर्द एक ही है—संतान की चाह।

पहली कहानी है सुकुमार की, जो एक आदिवासी गांव में रहने वाला साधारण व्यक्ति है। वह लंबे समय से बच्चा पाने के लिए तरस रहा है। इस चाह में वह धार्मिक अनुष्ठानों और अंधविश्वासों का सहारा लेने लगता है।

चारक मेले के दौरान वह मुख्य पुजारी बनता है और परंपरा के अनुसार लोहे के हुक से खुद को हवा में लटकाकर तपस्या करता है।

दूसरी कहानी पुलिस अधिकारी सुभाष शर्मा और उनकी पत्नी शेफाली की है। दोनों पढ़े-लिखे और आधुनिक सोच वाले लोग हैं, लेकिन शादी के दस साल बाद भी उनके घर संतान नहीं है।

सुभाष की मां के दबाव में आकर यह शिक्षित दंपत्ति भी जड़ी-बूटी और टोटकों का सहारा लेने लगते हैं। यह पहलू दिखाता है कि अंधविश्वास केवल गरीब या अशिक्षित लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि पढ़े-लिखे और संपन्न लोग भी इससे प्रभावित हो सकते हैं।

शानदार सिनेमैटोग्राफी

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसकी सिनेमैटोग्राफी है। मानस भट्टाचार्य और प्रसंतानु मोहापात्रा ने कैमरे के जरिए फिल्म के माहौल को बेहद प्रभावशाली बनाया है।

प्राकृतिक दृश्य, पहाड़ियां और गांव का वातावरण एक तरफ बेहद शांत और सुंदर दिखता है, लेकिन दूसरी तरफ उनमें छिपा डर और तनाव भी महसूस होता है।

कई दृश्य ऐसे हैं जो दर्शकों को असहज कर देते हैं। जैसे तांत्रिकों और अघोरियों का खोपड़ी से पानी पीना या पूजा-पाठ करना।

चारक मेले के दौरान श्रद्धालुओं का शरीर में लोहे की छड़ें आरपार करना और हवा में झूलना भी बेहद प्रभावशाली और वास्तविक लगता है।

इन दृश्यों में डॉक्यूमेंट्री जैसा यथार्थ झलकता है, जो फिल्म को और ज्यादा प्रभावशाली बनाता है।

संगीत और बैकग्राउंड स्कोर

फिल्म का संगीत भी इसकी कहानी को मजबूती देता है।

विशाख ज्योति का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर कहानी के रहस्यमयी और डरावने माहौल को और गहरा करता है। खासकर घोर अघोर और यज्ञ कुंड जैसे ट्रैक कहानी की गंभीरता और वातावरण को और प्रभावी बनाते हैं।

फोक, क्लासिकल और पारंपरिक धुनों का मिश्रण फिल्म के माहौल के साथ पूरी तरह मेल खाता है।

दमदार अभिनय

फिल्म में कलाकारों का अभिनय बेहद प्रभावशाली है।

सुब्रत दत्ता ने बिरसा के शराबी और जुआरी पिता मनोरंजन की भूमिका को बहुत ही वास्तविक तरीके से निभाया है।

मनोस्री बिस्वास ने बिरसा की मां के किरदार में सादगी और भावनात्मक गहराई दिखाई है।

वहीं शशि भूषण ने सुकुमार के रूप में एक ऐसे इंसान की पीड़ा और बेचैनी को शानदार तरीके से दिखाया है, जो संतान पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।

अंजलि पाटिल और साहिदुर रहमान ने भी अपने किरदारों में गहराई और विश्वसनीयता लाई है।

इसके अलावा बाल कलाकार शंखदीप और शौमल श्यामल का अभिनय भी काफी प्रभावशाली है।

फिल्म का संदेश

यह फिल्म सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है। इसके जरिए निर्देशक समाज में फैले अंधविश्वास और धार्मिक कट्टरता पर सवाल उठाते हैं।

फिल्म यह दिखाती है कि आस्था अच्छी बात है, लेकिन जब वह तर्क और समझ से दूर हो जाती है, तो वह खतरनाक अंधविश्वास का रूप ले सकती है।

निष्कर्ष

Charak Movie Review: चांदपुर चारक मेला एक ऐसी फिल्म है जो रहस्य, सामाजिक मुद्दों और भावनाओं को बेहद प्रभावी तरीके से जोड़ती है।

शानदार विजुअल्स, दमदार अभिनय और मजबूत कहानी इसे एक यादगार फिल्म बनाते हैं।

यदि आपको रहस्य और सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्में पसंद हैं, तो यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए।

यह फिल्म आपको सिर्फ मनोरंजन ही नहीं देगी, बल्कि समाज के एक कड़वे सच से भी रूबरू कराएगी।

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M.S. Siddiqui

Prime News 24 के लेखक एम. एस. सिद्दीकी मनोरंजन और बॉलीवुड से जुड़ी खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं। वे पाठकों को आसान और साफ भाषा में ताज़ा जानकारी और निष्पक्ष विश्लेषण देते हैं।

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