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Mardaani 3 Movie Review: दमदार शुरुआत के बाद क्यों फिसल गई रानी मुखर्जी की फिल्म?

Mardaani 3 Review Hindi: रानी मुखर्जी की Mardaani 3 एक मजबूत सामाजिक मुद्दे के साथ शुरू होती है, लेकिन इंटरवल के बाद कहानी दम खो देती है। जानिए फिल्म की खूबियां और कमियां।

Mardaani 3 Review Hindi

Mardaani 3 एक बार फिर सामाजिक मुद्दे को केंद्र में रखकर सशक्त महिला पुलिस अफसर की कहानी कहने की कोशिश करती है। लगभग एक दशक पहले शुरू हुई इस फ्रेंचाइज़ी का मकसद था – एक्शन हीरो की पुरुष प्रधान छवि को चुनौती देना। इस तीसरे भाग में भी वही कोशिश दिखाई देती है, लेकिन इस बार कहानी आधे रास्ते में आकर लड़खड़ा जाती है।

फिल्म की शुरुआत बेहद सशक्त और झकझोर देने वाली है। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के पास एक फार्महाउस से दो बच्चियों का अपहरण हो जाता है। खास बात यह है कि एक बच्ची एक राजनयिक परिवार से है, जबकि दूसरी एक साधारण सुरक्षा गार्ड की बेटी। यहीं से फिल्म एक अहम सवाल उठाती है – क्या दोनों जिंदगियों की कीमत बराबर है?

सिस्टम बनाम इंसानियत की टकराहट

शिवानी शिवाजी रॉय (Rani Mukerji) को ऊपर से साफ निर्देश मिलते हैं कि सिर्फ राजनयिक की बेटी को प्राथमिकता दी जाए। जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, यह साफ हो जाता है कि मामला किसी राजनीतिक साजिश का नहीं बल्कि बाल तस्करी और भिखारी माफिया के एक संगठित नेटवर्क का है।

फिल्म का पहला हाफ यहीं अपनी पकड़ मजबूत करता है। सिस्टम की बेरुखी, वर्गभेद और सामाजिक असमानता को कहानी बेबाकी से सामने रखती है। शिवानी का संघर्ष सिर्फ अपराधियों से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से भी है जो तय करती है कि किसकी जान ज्यादा मायने रखती है।

महिला बनाम महिला की दिलचस्प जंग

फिल्म में असली टकराव शिवानी और ‘अम्मा’ के बीच है, जो भिखारी माफिया की सरगना है। अम्मा का किरदार शुरुआत में काफी डरावना और प्रभावशाली लगता है। उसका बैकग्राउंड दिखाता है कि कैसे व्यवस्था की सड़ांध इंसानों को राक्षस बना देती है।

डायरेक्टर अभिराज मिनावाला और लेखक आयुष गुप्ता एक ऐसी दुनिया रचते हैं जहाँ कोई भी पूरी तरह सही या गलत नहीं है। यह ग्रे शेड्स फिल्म को पहले हाफ में गंभीर और असरदार बनाते हैं।

इंटरवल के बाद क्यों टूटती है फिल्म?

समस्या इंटरवल के बाद शुरू होती है। जिस सामाजिक संवेदनशीलता और नारीवादी दृष्टिकोण के साथ फिल्म आगे बढ़ रही थी, वह धीरे-धीरे फॉर्मूला सिनेमा में बदल जाती है। एक निडर महिला पुलिस अफसर, एक बड़ा सामाजिक मुद्दा और एक खतरनाक विलेन – यह समीकरण पहले भी देखा जा चुका है।

कहानी में नयापन सीमित रह जाता है। अम्मा जैसे मजबूत महिला विलेन को पूरा स्पेस देने के बजाय, फिल्म अचानक एक पुरुष खलनायक की ओर मुड़ जाती है। ऐसा लगता है मानो फ्रेंचाइज़ी के नियमों के तहत आखिर में किसी “पुरुष दुश्मन” को हराना जरूरी हो।

ओवरराइटिंग और जबरदस्ती का संदेश

रानी मुखर्जी का अभिनय हमेशा की तरह दमदार है, लेकिन इस बार उनका किरदार जरूरत से ज्यादा ओवरराइट किया गया लगता है। संवाद इतने भारी और सीधे संदेश देने वाले हैं कि भावनाओं के लिए जगह कम पड़ जाती है। जहां पहले पार्ट्स में खामोशी भी बहुत कुछ कहती थी, यहां हर भावना को शब्दों से ठूंसा गया है।

दूसरे हाफ में अचानक जो विदेशी साजिश वाला एंगल जोड़ा जाता है, वह कहानी को और कमजोर करता है। इससे न सिर्फ प्लॉट में छेद नजर आते हैं, बल्कि टोन भी असंतुलित हो जाती है।

सहायक किरदारों का अधूरा इस्तेमाल

पिछली फिल्मों में विलेन के किरदार बेहद यादगार थे। इस बार अम्मा का किरदार भी वैसा बन सकता था, लेकिन उसे बीच में ही कमजोर कर दिया जाता है। कुछ सहायक किरदार पहले से अनुमानित लगते हैं और उनके साथ क्या होने वाला है, यह दूर से समझ आ जाता है।

क्लाइमेक्स तक पहुंचते-पहुंचते सस्पेंस खत्म हो जाता है और फिल्म एक रूटीन थ्रिलर में बदल जाती है।

निष्कर्ष

Mardaani 3 एक बेहद जरूरी और संवेदनशील मुद्दे पर बात करती है। फिल्म का पहला हाफ साहसी, प्रभावशाली और सवाल उठाने वाला है। लेकिन दूसरा हाफ कहानी को संभाल नहीं पाता। ओवरड्रामैटिक ट्रीटमेंट, कमजोर प्लॉट ट्विस्ट और फॉर्मूला अप्रोच इसकी सबसे बड़ी कमियां हैं।

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M.S. Siddiqui

Prime News 24 के लेखक एम. एस. सिद्दीकी मनोरंजन और बॉलीवुड से जुड़ी खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं। वे पाठकों को आसान और साफ भाषा में ताज़ा जानकारी और निष्पक्ष विश्लेषण देते हैं।

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